Monday, December 10, 2012

fdi nri and india

चलो भाई देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानि एफडीआई, एनआरआई से काफी मिलता जुलता है, आने का रास्ता साफ तकरीबन साफ हो गया है। इस कामयाबी पर सत्ताधारी खेमे के लोग इस कदर ठिठोली कर रहे हैं जैसे गांव में किसी गोरी मेम के आ जाने से स्कूल में पढऩे वाले लौंडे मस्ती करते हैं। दूसरी ओर गांव की चौपाल पर बैठा बूढ़ा किसान अपने पुराने चश्मे के टूटे कांच के पीछे से इठलात बलखाती एफडीआई को ऐसे ही देख रहा है जैसे गा
ंव में किसी के घर हद से ज्यादा बनने ठनने वाली बहू आ जाए। लौंडों के लिए एनआरआई की बहन एफडीआई ग्लैमर का बहाना है लेकिन बुजुर्ग किसान के लिए एफडीआई गला दाब के मरने का कारण न बन जाए, वह इसी सोच में डूबा है।
चलिए खैर कोई बात नहीं है। एफडीआई को भी आने दीजिए उसे भी झेला जाएगा। आप लोग तो जानते ही हैं कि हम हिंदुस्तानी लोग झेलने में माहिर हैं। न जाने इस देश में कौन कौन आया और हम झेलते गए, हजारों सालों का अनुभव है। जानकार कहते हैं हजारों साल पहले ईरान से आर्य आए, फिर मुस्लिम आए, फिर मुगल आए और उसके पुर्तगाली, फ्रेंच, डच और ब्रिटिश भी आए। इस देश ने और यहां के लोगों ने सब को झेला और समय आने पर सबको पेला। लेकिन इसके बाद भी काफी कुछ बदला नहीं है।
लोग जहां पहले लस्सी, शिकंजी या फिर बंटा की बोतल से गला तर करते थे। उदारीकरण के साथ अमरीकी पेप्सी लोगों की प्यास बुझाने लगी। अंकल की चिप्स आई और वह आलू जिसकी पकौड़ी लोग २० रुपए किलो खरीदना पसंद नहीं करते थे, वहीं अब अंकल और दूसरे चिप्स को तकरीबन ४०० रुपए किलो के भाव पर खरीद कर अमीर होने के एहसास से सराबोर हैं।
जब तक उदारीकरण नहीं हुआ तब तक सरकार ने कर्मचारियों को नौकरी से निकालने की नीति पर सख्ती से अमल नहीं किया था लेकिन इसके बाद तो सरकारी की नीति ही कर्मचारियों से पल्ला झाडऩे की बन गई है।
ऐसा हो भी क्यों न हो। पहले जो पैसा सरकार और देश की कंपनियों को मिलता था, वह पैसा अब विदेशी एमएनसी अपने देश लपेट कर ले जा रही हैं। और हमारे देश को घाटे की अर्थव्यवस्था बना रही हैं। सरकार कर्मचारियों को निकाल रहा है तो निजी क्षेत्र मंदी के नाम पर कर्मचारियों की वेतन वृद्धि न कर उनका खून चूस रहा है।
लेकिन एफडीआई के आने से सत्ताधारी दल झूम रहा है उससे तो लगता है कि देश की बदहाली शायद बड़े अमरीकी स्टोरों की दुकाने खुलने से दूर हो जाएगी। बेशक वह सारा मुनाफा अपने देश की बदहाली को दूर करने में लगा दें।
इसे पढऩे वालों में कई मित्र उदारीकरण, एफडीआई के समर्थक भी होंगे, अगर उनकी भावनाओं को चोट पहुंचे तो वालमार्ट के आने का इंतजार कीजिए और साइड इफैक्ट रहित विदेशी ओइंटमेंट जख्मों पर लगाकर उसे सहलाएं।
आपका दिन शुभ हो...

No comments: