वैदिक काल में सीता हरण, महाभारत में द्रोपदी चीर हरण, मुगल काल व अंग्रेजी शासन में हिंदुस्तानी राजकुमारियां व रानियों, राजधानी में संजय व गीता चोपड़ा, मुंबई में अरुणा शानबाग, पश्चिम बंगाल में खेतल पारिख, राजधानी में प्रियदर्शनी मट्टू और अब वसंत विहार गैंग रेप की पीडि़ता और इससे पहले न जाने कितनी युवतियां व महिलाएं जिनकी कहानी पन्नों में दर्ज नहीं हो सकी, दुष्कर्म अथवा यौन शोषण का शिकार हो चुकी हैं।
दुष्कर्म की इतनी सारी घटनाएं शायद ही किसी ओर देश या समाज में होती होंगी जितनी हमारे सुसंस्कृत भारतीय समाज में होती हैं। क्या दुष्कर्म हमारी मानसिकता, हमारे समाज या हमारी संस्कृति का हिस्सा बन चुका है।
किसी भी अकेली युवती या महिला को देखकर हम उस पर गिद्ध की तरह क्यों टूट पड़ते हैं। यह किस चीज का नतीजा है, यह आधुनिकता का त्रुटिपूर्ण प्रतिबिंब है या हमारी संस्कृति में ही कुछ कमी या बुराई है।
समाज में फैली इस बुराइ की सफाईकैसे होगी और कौन इस सफाइ को अंजाम देगा। इसकी जिम्मेदारी किस पर डालें पुलिस पर, राजनेताओं पर, समाज शास्त्रियों पर या खुद अपने आप पर, सोचिए।
राजधानी में जब भी किसी युवती या महिलाओं के साथ कुछ गलत होता है तो सीजनल समाज सेवी व सेलेब्रेटी टेलीविजन स्क्रीन पर कब्जा जमा कर बैठ जाते हैं।
आजकल भी कुछ ऐसा ही नजारा कइ चैनलों पर नजर आ रहा है। एक सबसे तेज चैनल कानून न जानने वाले लोगों से कानून पर चर्र्चा करवा रहा है तो सड़क पर उतरे जुनूनी युवक युवतियां दुष्कम के आरोपियों को फांसी देने की मांग कर रहे हैं जोकि फिलहाल मौजूदा कानून में संभव नहीं है। दूसरी ओर कानून एक दिन में बदलेगा नहीं।
विरोध दर्ज कराएं लेकिन संयमित रहें, हजारों साल पुरानी बुराइ है एक दिन में सुधार नहीं होगा। कहीं ऐसा न हो कि आगजनी, तोडफ़ोड़ व दंगा भड़काने के आरोप में कानूनी शिकंजी में फंस जाएं या फिर अपनी हड्डियां तुड़वाकर अस्पताल में पड़े रहें।
Sunday, December 23, 2012
Monday, December 10, 2012
çÁ×ðÎæÚU ·¤æñÙ...
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Áæð Üæðचलो भाई देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानि एफडीआई, एनआरआई से काफी मिलता जुलता है, आने का रास्ता साफ तकरीबन साफ हो गया है। इस कामयाबी पर सत्ताधारी खेमे के लोग इस कदर ठिठोली कर रहे हैं जैसे गांव में किसी गोरी मेम के आ जाने से स्कूल में पढऩे वाले लौंडे मस्ती करते हैं। दूसरी ओर गांव की चौपाल पर बैठा बूढ़ा किसान अपने पुराने चश्मे के टूटे कांच के पीछे से इठलात बलखाती एफडीआई को ऐसे ही देख रहा है जैसे गा
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Áæð Üæðचलो भाई देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानि एफडीआई, एनआरआई से काफी मिलता जुलता है, आने का रास्ता साफ तकरीबन साफ हो गया है। इस कामयाबी पर सत्ताधारी खेमे के लोग इस कदर ठिठोली कर रहे हैं जैसे गांव में किसी गोरी मेम के आ जाने से स्कूल में पढऩे वाले लौंडे मस्ती करते हैं। दूसरी ओर गांव की चौपाल पर बैठा बूढ़ा किसान अपने पुराने चश्मे के टूटे कांच के पीछे से इठलात बलखाती एफडीआई को ऐसे ही देख रहा है जैसे गा
ंव
में किसी के घर हद से ज्यादा बनने ठनने वाली बहू आ जाए। लौंडों के लिए
एनआरआई की बहन एफडीआई ग्लैमर का बहाना है लेकिन बुजुर्ग किसान के लिए
एफडीआई गला दाब के मरने का कारण न बन जाए, वह इसी सोच में डूबा है।
चलिए खैर कोई बात नहीं है। एफडीआई को भी आने दीजिए उसे भी झेला जाएगा। आप लोग तो जानते ही हैं कि हम हिंदुस्तानी लोग झेलने में माहिर हैं। न जाने इस देश में कौन कौन आया और हम झेलते गए, हजारों सालों का अनुभव है। जानकार कहते हैं हजारों साल पहले ईरान से आर्य आए, फिर मुस्लिम आए, फिर मुगल आए और उसके पुर्तगाली, फ्रेंच, डच और ब्रिटिश भी आए। इस देश ने और यहां के लोगों ने सब को झेला और समय आने पर सबको पेला। लेकिन इसके बाद भी काफी कुछ बदला नहीं है।
लोग जहां पहले लस्सी, शिकंजी या फिर बंटा की बोतल से गला तर करते थे। उदारीकरण के साथ अमरीकी पेप्सी लोगों की प्यास बुझाने लगी। अंकल की चिप्स आई और वह आलू जिसकी पकौड़ी लोग २० रुपए किलो खरीदना पसंद नहीं करते थे, वहीं अब अंकल और दूसरे चिप्स को तकरीबन ४०० रुपए किलो के भाव पर खरीद कर अमीर होने के एहसास से सराबोर हैं।
जब तक उदारीकरण नहीं हुआ तब तक सरकार ने कर्मचारियों को नौकरी से निकालने की नीति पर सख्ती से अमल नहीं किया था लेकिन इसके बाद तो सरकारी की नीति ही कर्मचारियों से पल्ला झाडऩे की बन गई है।
ऐसा हो भी क्यों न हो। पहले जो पैसा सरकार और देश की कंपनियों को मिलता था, वह पैसा अब विदेशी एमएनसी अपने देश लपेट कर ले जा रही हैं। और हमारे देश को घाटे की अर्थव्यवस्था बना रही हैं। सरकार कर्मचारियों को निकाल रहा है तो निजी क्षेत्र मंदी के नाम पर कर्मचारियों की वेतन वृद्धि न कर उनका खून चूस रहा है।
लेकिन एफडीआई के आने से सत्ताधारी दल झूम रहा है उससे तो लगता है कि देश की बदहाली शायद बड़े अमरीकी स्टोरों की दुकाने खुलने से दूर हो जाएगी। बेशक वह सारा मुनाफा अपने देश की बदहाली को दूर करने में लगा दें।
इसे पढऩे वालों में कई मित्र उदारीकरण, एफडीआई के समर्थक भी होंगे, अगर उनकी भावनाओं को चोट पहुंचे तो वालमार्ट के आने का इंतजार कीजिए और साइड इफैक्ट रहित विदेशी ओइंटमेंट जख्मों पर लगाकर उसे सहलाएं।
आपका दिन शुभ हो...
» ãUæÎâð ×ð´ ׿ÚÔU »° ßãU Üæð» ©Uâ §U׿ÚUÌ ×ð´ 15 âæñ âð 25 âæñ M¤Â° ×ãUèÙæ ·ð¤ ç·¤ÚUæ° ÂÚU ÚUãUÌð ÍðÐ ØãU ç·¤ÚUæØæ Öè ßãU Üæð» ÕǸè ×éçà·¤Ü âð ÁéÅUæ ÂæÌð ÍðÐ Áæð ·¤æ× âÚU·¤æÚU ·¤æð ·¤ÚUÙæ ¿æçãU° Íæ ßãU ·¤æ× âÚUÎæÚU ¥×ëÌ徆 çâ´ãU Ùð ç·¤ØæÐ ·¤æò×ÙßðËÍ ¹ðÜæð´ ·ð¤ çܰ ÁÙÌæ ·¤è »æÉ¸Uè ·¤×æ§üU ·ð¤ 70 ãUÁæÚU ·¤ÚUæðǸ M¤ÂØæð´ ·¤è ¥æãêUçÌ ç΄è âÚU·¤æÚU Ùð Îð ÎèÐ Üðç·¤Ù âÚU·¤æÚU ·¤Öè °ðâè ·¤æð§üU ØæðÁÙæ ÙãUè´ ÕÙæ â·¤è çÁââð Îðàæ ·ð¤ »ÚUèÕ ×ÁÎêÚU Ìշ𤠷¤æð çâÚU ÉU·¤Ùð ·ð¤ çܰ ×ãUÈê¤Á ÀUÌ ç×Ü â·ð¤Ð चलिए खैर कोई बात नहीं है। एफडीआई को भी आने दीजिए उसे भी झेला जाएगा। आप लोग तो जानते ही हैं कि हम हिंदुस्तानी लोग झेलने में माहिर हैं। न जाने इस देश में कौन कौन आया और हम झेलते गए, हजारों सालों का अनुभव है। जानकार कहते हैं हजारों साल पहले ईरान से आर्य आए, फिर मुस्लिम आए, फिर मुगल आए और उसके पुर्तगाली, फ्रेंच, डच और ब्रिटिश भी आए। इस देश ने और यहां के लोगों ने सब को झेला और समय आने पर सबको पेला। लेकिन इसके बाद भी काफी कुछ बदला नहीं है।
लोग जहां पहले लस्सी, शिकंजी या फिर बंटा की बोतल से गला तर करते थे। उदारीकरण के साथ अमरीकी पेप्सी लोगों की प्यास बुझाने लगी। अंकल की चिप्स आई और वह आलू जिसकी पकौड़ी लोग २० रुपए किलो खरीदना पसंद नहीं करते थे, वहीं अब अंकल और दूसरे चिप्स को तकरीबन ४०० रुपए किलो के भाव पर खरीद कर अमीर होने के एहसास से सराबोर हैं।
जब तक उदारीकरण नहीं हुआ तब तक सरकार ने कर्मचारियों को नौकरी से निकालने की नीति पर सख्ती से अमल नहीं किया था लेकिन इसके बाद तो सरकारी की नीति ही कर्मचारियों से पल्ला झाडऩे की बन गई है।
ऐसा हो भी क्यों न हो। पहले जो पैसा सरकार और देश की कंपनियों को मिलता था, वह पैसा अब विदेशी एमएनसी अपने देश लपेट कर ले जा रही हैं। और हमारे देश को घाटे की अर्थव्यवस्था बना रही हैं। सरकार कर्मचारियों को निकाल रहा है तो निजी क्षेत्र मंदी के नाम पर कर्मचारियों की वेतन वृद्धि न कर उनका खून चूस रहा है।
लेकिन एफडीआई के आने से सत्ताधारी दल झूम रहा है उससे तो लगता है कि देश की बदहाली शायद बड़े अमरीकी स्टोरों की दुकाने खुलने से दूर हो जाएगी। बेशक वह सारा मुनाफा अपने देश की बदहाली को दूर करने में लगा दें।
इसे पढऩे वालों में कई मित्र उदारीकरण, एफडीआई के समर्थक भी होंगे, अगर उनकी भावनाओं को चोट पहुंचे तो वालमार्ट के आने का इंतजार कीजिए और साइड इफैक्ट रहित विदेशी ओइंटमेंट जख्मों पर लगाकर उसे सहलाएं।
आपका दिन शुभ हो...
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fdi nri and india
चलो भाई देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानि
एफडीआई, एनआरआई से काफी मिलता जुलता है, आने का रास्ता साफ तकरीबन साफ हो
गया है। इस कामयाबी पर सत्ताधारी खेमे के लोग इस कदर ठिठोली कर रहे हैं
जैसे गांव में किसी गोरी मेम के आ जाने से स्कूल में पढऩे वाले लौंडे मस्ती
करते हैं। दूसरी ओर गांव की चौपाल पर बैठा बूढ़ा किसान अपने पुराने चश्मे
के टूटे कांच के पीछे से इठलात बलखाती एफडीआई को ऐसे ही देख रहा है जैसे गा
ंव
में किसी के घर हद से ज्यादा बनने ठनने वाली बहू आ जाए। लौंडों के लिए
एनआरआई की बहन एफडीआई ग्लैमर का बहाना है लेकिन बुजुर्ग किसान के लिए
एफडीआई गला दाब के मरने का कारण न बन जाए, वह इसी सोच में डूबा है।
चलिए खैर कोई बात नहीं है। एफडीआई को भी आने दीजिए उसे भी झेला जाएगा। आप लोग तो जानते ही हैं कि हम हिंदुस्तानी लोग झेलने में माहिर हैं। न जाने इस देश में कौन कौन आया और हम झेलते गए, हजारों सालों का अनुभव है। जानकार कहते हैं हजारों साल पहले ईरान से आर्य आए, फिर मुस्लिम आए, फिर मुगल आए और उसके पुर्तगाली, फ्रेंच, डच और ब्रिटिश भी आए। इस देश ने और यहां के लोगों ने सब को झेला और समय आने पर सबको पेला। लेकिन इसके बाद भी काफी कुछ बदला नहीं है।
लोग जहां पहले लस्सी, शिकंजी या फिर बंटा की बोतल से गला तर करते थे। उदारीकरण के साथ अमरीकी पेप्सी लोगों की प्यास बुझाने लगी। अंकल की चिप्स आई और वह आलू जिसकी पकौड़ी लोग २० रुपए किलो खरीदना पसंद नहीं करते थे, वहीं अब अंकल और दूसरे चिप्स को तकरीबन ४०० रुपए किलो के भाव पर खरीद कर अमीर होने के एहसास से सराबोर हैं।
जब तक उदारीकरण नहीं हुआ तब तक सरकार ने कर्मचारियों को नौकरी से निकालने की नीति पर सख्ती से अमल नहीं किया था लेकिन इसके बाद तो सरकारी की नीति ही कर्मचारियों से पल्ला झाडऩे की बन गई है।
ऐसा हो भी क्यों न हो। पहले जो पैसा सरकार और देश की कंपनियों को मिलता था, वह पैसा अब विदेशी एमएनसी अपने देश लपेट कर ले जा रही हैं। और हमारे देश को घाटे की अर्थव्यवस्था बना रही हैं। सरकार कर्मचारियों को निकाल रहा है तो निजी क्षेत्र मंदी के नाम पर कर्मचारियों की वेतन वृद्धि न कर उनका खून चूस रहा है।
लेकिन एफडीआई के आने से सत्ताधारी दल झूम रहा है उससे तो लगता है कि देश की बदहाली शायद बड़े अमरीकी स्टोरों की दुकाने खुलने से दूर हो जाएगी। बेशक वह सारा मुनाफा अपने देश की बदहाली को दूर करने में लगा दें।
इसे पढऩे वालों में कई मित्र उदारीकरण, एफडीआई के समर्थक भी होंगे, अगर उनकी भावनाओं को चोट पहुंचे तो वालमार्ट के आने का इंतजार कीजिए और साइड इफैक्ट रहित विदेशी ओइंटमेंट जख्मों पर लगाकर उसे सहलाएं।
आपका दिन शुभ हो...
चलिए खैर कोई बात नहीं है। एफडीआई को भी आने दीजिए उसे भी झेला जाएगा। आप लोग तो जानते ही हैं कि हम हिंदुस्तानी लोग झेलने में माहिर हैं। न जाने इस देश में कौन कौन आया और हम झेलते गए, हजारों सालों का अनुभव है। जानकार कहते हैं हजारों साल पहले ईरान से आर्य आए, फिर मुस्लिम आए, फिर मुगल आए और उसके पुर्तगाली, फ्रेंच, डच और ब्रिटिश भी आए। इस देश ने और यहां के लोगों ने सब को झेला और समय आने पर सबको पेला। लेकिन इसके बाद भी काफी कुछ बदला नहीं है।
लोग जहां पहले लस्सी, शिकंजी या फिर बंटा की बोतल से गला तर करते थे। उदारीकरण के साथ अमरीकी पेप्सी लोगों की प्यास बुझाने लगी। अंकल की चिप्स आई और वह आलू जिसकी पकौड़ी लोग २० रुपए किलो खरीदना पसंद नहीं करते थे, वहीं अब अंकल और दूसरे चिप्स को तकरीबन ४०० रुपए किलो के भाव पर खरीद कर अमीर होने के एहसास से सराबोर हैं।
जब तक उदारीकरण नहीं हुआ तब तक सरकार ने कर्मचारियों को नौकरी से निकालने की नीति पर सख्ती से अमल नहीं किया था लेकिन इसके बाद तो सरकारी की नीति ही कर्मचारियों से पल्ला झाडऩे की बन गई है।
ऐसा हो भी क्यों न हो। पहले जो पैसा सरकार और देश की कंपनियों को मिलता था, वह पैसा अब विदेशी एमएनसी अपने देश लपेट कर ले जा रही हैं। और हमारे देश को घाटे की अर्थव्यवस्था बना रही हैं। सरकार कर्मचारियों को निकाल रहा है तो निजी क्षेत्र मंदी के नाम पर कर्मचारियों की वेतन वृद्धि न कर उनका खून चूस रहा है।
लेकिन एफडीआई के आने से सत्ताधारी दल झूम रहा है उससे तो लगता है कि देश की बदहाली शायद बड़े अमरीकी स्टोरों की दुकाने खुलने से दूर हो जाएगी। बेशक वह सारा मुनाफा अपने देश की बदहाली को दूर करने में लगा दें।
इसे पढऩे वालों में कई मित्र उदारीकरण, एफडीआई के समर्थक भी होंगे, अगर उनकी भावनाओं को चोट पहुंचे तो वालमार्ट के आने का इंतजार कीजिए और साइड इफैक्ट रहित विदेशी ओइंटमेंट जख्मों पर लगाकर उसे सहलाएं।
आपका दिन शुभ हो...
Tuesday, April 03, 2012
death sentence
read my front page exclusive byline story published on wednesday march 28,2012 in Amar ujala Delhi Edition. all others are carrying this story tomorrow, wednesday, one week later.
http://epaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20120328a_001101005&ileft=139&itop=687&zoomRatio=130&AN=20120328a_001101005
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