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Sunday, December 23, 2012

is rape part of our history

वैदिक काल में सीता हरण, महाभारत में द्रोपदी चीर हरण, मुगल काल व अंग्रेजी शासन में हिंदुस्तानी राजकुमारियां व रानियों, राजधानी में संजय व गीता चोपड़ा, मुंबई में अरुणा शानबाग, पश्चिम बंगाल में खेतल पारिख, राजधानी में प्रियदर्शनी मट्टू और अब वसंत विहार गैंग रेप की पीडि़ता और इससे पहले न जाने कितनी युवतियां व महिलाएं जिनकी कहानी पन्नों में दर्ज नहीं हो सकी, दुष्कर्म अथवा यौन शोषण का शिकार हो चुकी हैं।
दुष्कर्म की इतनी सारी घटनाएं शायद ही किसी ओर देश या समाज में होती होंगी जितनी हमारे सुसंस्कृत भारतीय समाज में होती हैं। क्या दुष्कर्म हमारी मानसिकता, हमारे समाज या हमारी संस्कृति का हिस्सा बन चुका है।
किसी भी अकेली युवती या महिला को देखकर हम उस पर गिद्ध की तरह क्यों टूट पड़ते हैं। यह किस चीज का नतीजा है, यह आधुनिकता का त्रुटिपूर्ण प्रतिबिंब है या हमारी संस्कृति में ही कुछ कमी या बुराई है।
समाज में फैली इस बुराइ की सफाईकैसे होगी और कौन इस सफाइ को अंजाम देगा। इसकी जिम्मेदारी किस पर डालें पुलिस पर, राजनेताओं पर, समाज शास्त्रियों पर या खुद अपने आप पर, सोचिए।
राजधानी में जब भी किसी युवती या महिलाओं के साथ कुछ गलत होता है तो सीजनल समाज सेवी व सेलेब्रेटी टेलीविजन स्क्रीन पर कब्जा जमा कर बैठ जाते हैं।
आजकल भी कुछ ऐसा ही नजारा कइ चैनलों पर नजर आ रहा है। एक सबसे तेज चैनल कानून न जानने वाले लोगों से कानून पर चर्र्चा करवा रहा है तो सड़क पर उतरे जुनूनी युवक युवतियां दुष्कम के आरोपियों को फांसी देने की मांग कर रहे हैं जोकि फिलहाल मौजूदा कानून में संभव नहीं है। दूसरी ओर कानून एक दिन में बदलेगा नहीं।
विरोध दर्ज कराएं लेकिन संयमित रहें, हजारों साल पुरानी बुराइ है एक दिन में सुधार नहीं होगा। कहीं ऐसा न हो कि आगजनी, तोडफ़ोड़ व दंगा भड़काने के आरोप में कानूनी शिकंजी में फंस जाएं या फिर अपनी हड्डियां तुड़वाकर अस्पताल में पड़े रहें।